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सेहत और श्रद्धा का संगम: कैसे सकट चौथ का व्रत बच्चों के स्वास्थ्य के लिए है एक सुरक्षा कवच

आज सकट चौथ है, जिसे संकट चतुर्थी, तिलकुट चौथ या माघी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय संस्कृति में त्योहार सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, बल्कि उनके पीछे गहरा वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी दृष्टिकोण भी छिपा होता है। सकट चौथ का यह व्रत, जो मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और सुख समृद्धि के लिए रखती हैं, वास्तव में कुपोषण के खिलाफ एक बहुत बड़ा पारंपरिक अभियान है।

परंपरा और पोषण का अद्भुत मेल
सकट चौथ के केंद्र में भगवान गणेश की पूजा और 'तिलकुट' का प्रसाद होता है। अगर हम इस व्रत के खानपान और इसके समय पर गौर करें, तो समझ आता है कि यह सीधे तौर पर बच्चों के शारीरिक विकास और पोषण से जुड़ा है। माघ के महीने में पड़ने वाला यह व्रत भीषण ठंड के समय आता है। इस समय शरीर को ऐसी ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो न केवल गर्मी दे, बल्कि रोगों से लड़ने की शक्ति भी प्रदान करे।

भगवान गणेश को चढ़ाया जाने वाला मुख्य भोग तिल और गुड़ से बना 'तिलकुट' है। आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही तिल और गुड़ को "सुपरफूड" मानते हैं। तिल में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, मैग्नीशियम और हेल्दी फैट्स होते हैं, जबकि गुड़ आयरन का सबसे बेहतरीन स्रोत है। बच्चों में अक्सर देखी जाने वाली 'एनीमिया' (खून की कमी) और हड्डियों की कमजोरी जैसी कुपोषण की समस्याओं के लिए यह प्रसाद एक प्राकृतिक औषधि की तरह काम करता है।

कुपोषण के खिलाफ एक सामाजिक जागरूकता
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएं आज भी सीमित हैं, सकट चौथ जैसे व्रत माताओं को अपने बच्चों के आहार के प्रति सचेत करते हैं। इस दिन माताएं न केवल व्रत रखती हैं, बल्कि विशेष प्रकार के कंद मूल (जैसे शकरकंद) और फलों का उपयोग करती हैं। शकरकंद विटामिन ए और फाइबर का खजाना है, जो बच्चों की आंखों और पाचन तंत्र के लिए अनिवार्य है।

इस व्रत के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि संतान की रक्षा केवल प्रार्थना से नहीं, बल्कि उसे सही पोषण देने से भी होती है। जब एक मां तिल और गुड़ के लड्डू बनाकर अपने बच्चों को खिलाती है, तो वह अनजाने में ही उन्हें कुपोषण की बेड़ियों से मुक्त कर रही होती है। यह परंपरा सदियों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पोषण का ज्ञान पहुंचा रही है।

मनोवैज्ञानिक और शारीरिक सुरक्षा
सकट चौथ का व्रत केवल शारीरिक पोषण तक सीमित नहीं है। यह माता और संतान के बीच एक भावनात्मक बंधन को मजबूत करता है। मनोवैज्ञानिक रूप से, जब बच्चे देखते हैं कि उनकी माताएं उनकी भलाई के लिए कठिन उपवास कर रही हैं, तो उनमें सुरक्षा और जुड़ाव की भावना बढ़ती है।

साथ ही, इस व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। रात के समय चंद्रमा की किरणों में बैठकर पूजा करना और फिर प्रसाद ग्रहण करना मानसिक शांति प्रदान करता है। बदलते मौसम में जब बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है, तब तिल, गुड़ और मूंगफली जैसे खाद्य पदार्थ उन्हें भीतर से मजबूत बनाते हैं।

कुपोषण मुक्त भारत और हमारी परंपराएं
आज के दौर में जब सरकार कुपोषण के खिलाफ 'पोषण अभियान' चला रही है, तो हमें अपनी इन प्राचीन परंपराओं को नए दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। सकट चौथ यह सिखाता है कि स्थानीय और मौसमी खाद्य पदार्थों का उपयोग करके कैसे हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते हैं। तिलकुट का सेवन केवल एक दिन का अनुष्ठान नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे सर्दियों के आहार का हिस्सा बनाना चाहिए।

यदि हम सकट चौथ की इस मूल भावना को समझ लें, तो हम पाएंगे कि हमारे पूर्वजों ने धर्म की चादर में स्वास्थ्य के अनमोल सूत्र लपेट कर हमें दिए थे। यह व्रत हमें याद दिलाता है कि एक स्वस्थ बच्चा ही एक मजबूत राष्ट्र की नींव रख सकता है।