सन्नाटा, सुरक्षा बल और मलबे का ढेर: दिल्ली में देर रात हुई बड़ी कार्रवाई की पूरी कहानी
दिल्ली की सड़कों पर जब आधी रात को सन्नाटा पसरा था और लोग गहरी नींद में थे, तब भारी पुलिस बल के साथ बुलडोजरों की गड़गड़ाहट ने सन्नाटे को चीर दिया। दिल्ली के एक संवेदनशील इलाके में प्रशासन ने अतिक्रमण के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई में से एक को अंजाम दिया। इस "मिडनाइट ऑपरेशन" में न केवल अवैध निर्माणों को ढहाया गया, बल्कि दशकों से वहां चल रही दुकानों, सामुदायिक केंद्रों और जन-सुविधाओं को भी मलबे में तब्दील कर दिया गया।
क्या-क्या हुआ ज़मींदोज?
प्रशासन की इस कार्रवाई का केंद्र मस्जिद के पास का वह इलाका था, जहां कई महत्वपूर्ण संरचनाएं स्थित थीं। रिपोर्ट के अनुसार, कार्रवाई में निम्नलिखित निर्माणों को ढहाया गया: बारात घर और सामुदायिक केंद्र: स्थानीय निवासियों के लिए शादियों और सामाजिक कार्यक्रमों का इकलौता सहारा 'बारात घर' बुलडोजर की भेंट चढ़ गया। लोगों का कहना है कि इसी जगह पर गरीब परिवारों की बेटियों की शादियां कम खर्च में संपन्न होती थीं।
डिस्पेंसरी और स्वास्थ्य केंद्र: इलाके की एक पुरानी डिस्पेंसरी, जो प्राथमिक चिकित्सा के लिए सैकड़ों लोगों का सहारा थी, उसे भी नहीं बख्शा गया। प्रशासन का तर्क है कि यह स्वास्थ्य केंद्र वन भूमि या पीडब्ल्यूडी की ज़मीन पर अवैध रूप से बना था। दर्जनों दुकानें: मस्जिद के पास की मार्केट में वर्षों पुरानी दर्जनों दुकानें ढहा दी गईं। इनमें किराने की दुकानें, मरम्मत की दुकानें और छोटे ढाबे शामिल थे। दुकानदारों का आरोप है कि उन्हें अपना सामान निकालने तक का पर्याप्त समय नहीं दिया गया। धार्मिक स्थल के पास का निर्माण: हालांकि मुख्य धार्मिक स्थल को छुआ नहीं गया, लेकिन उसके आसपास के चबूतरे, कमरों और गेट को अतिक्रमण बताते हुए हटा दिया गया।
आधी रात को ही क्यों हुई कार्रवाई?
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि दिन के समय ऐसी कार्रवाई करने से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का डर रहता है। भीड़ जमा होने और विरोध प्रदर्शन की संभावना को देखते हुए "सरप्राइज एलिमेंट" का उपयोग किया गया। आधी रात को भारी संख्या में अर्धसैनिक बलों और दिल्ली पुलिस की तैनाती की गई। ड्रोन कैमरों से निगरानी रखी गई ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को तुरंत रोका जा सके।
स्थानीय निवासियों का दर्द और आक्रोश
जब सुबह सूरज उगा, तो मंजर पूरी तरह बदल चुका था। जहां कभी चहल-पहल रहती थी, वहां अब सिर्फ ईंट और सीमेंट का ढेर था। रोते हुए एक दुकानदार ने बताया, "मेरी तीन पीढ़ियां इसी दुकान से पली बढ़ीं। रातो रात मेरा सब कुछ खत्म हो गया। हमें कोई नोटिस नहीं मिला था।"
वहीं, स्थानीय महिलाओं ने इस कार्रवाई का पुरजोर विरोध किया। उनका कहना है कि कड़ाके की ठंड (या उमस भरी गर्मी) के बीच इस तरह से बेघर करना मानवाधिकारों का उल्लंघन है। कई लोगों ने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई चुनिंदा तरीके से की गई है।
प्रशासन और सरकार का पक्ष
दूसरी ओर, अतिक्रमण हटाने वाली एजेंसी का दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया कानूनी थी। अधिकारियों के अनुसार: इन निर्माणों को हटाने के लिए पहले कई बार मौखिक और लिखित नोटिस दिए गए थे। यह ज़मीन सरकारी थी और सार्वजनिक परियोजनाओं (जैसे सड़क चौड़ीकरण या मेट्रो कार्य) के लिए इसकी आवश्यकता थी। दिल्ली उच्च न्यायालय के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए प्रशासन ने कहा कि फुटपाथ और सार्वजनिक सड़कों को अतिक्रमण मुक्त रखना उनकी प्राथमिकता है।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
दिल्ली में बुलडोजर एक्शन कभी भी केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहता। इस घटना के बाद राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। विपक्षी दलों ने इसे "गरीबों पर हमला" करार दिया है, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि शहर के विकास के लिए अवैध कब्जों को हटाना अनिवार्य है।