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बछबारस व्रत का धार्मिक महत्व और पारिवारिक एकता पर प्रभाव

आज भाद्रपद मास की द्वादशी को पूरे भारत में बछबारस व्रत मनाया जा रहा है। यह व्रत मुख्य रूप से संतान के सुखद भविष्य, उनके स्वास्थ्य और परिवार की समृद्धि के लिए किया जाता है। इस दिन विशेष रूप से स्त्रियां और माता-पिता अपने बच्चों की लंबी उम्र, सफलता और खुशी के लिए उपवास रखते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं।


बछबारस व्रत की परंपरा सदियों पुरानी है। माना जाता है कि इस दिन किए गए उपवास और पूजा से बच्चों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और उन्हें जीवन में सफलता प्राप्त होती है। इस दिन विशेष रूप से गाय, बछड़ा और माता-पिता की पूजा का महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को रखने से परिवार में सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।


इस दिन भक्तजन सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और घर की साफ-सफाई के बाद घर की पूजा स्थल पर बछड़े की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पूजा करते हैं। पूजा में घी का दीपक, फूल, अक्षत और मिठाई का प्रयोग किया जाता है। व्रत रखने वाले लोग दिनभर अन्न और जल से संयम रखते हैं और केवल फलाहार या निर्जला उपवास करते हैं।


कुछ क्षेत्रों में यह व्रत विशेष रूप से संतान सुख और उनकी अच्छी सेहत के लिए रखा जाता है। माता-पिता अपने बच्चों की लंबी उम्र और सफलता के लिए मंत्रोच्चार करते हैं और व्रत के अंत में गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन और दान दिया जाता है। इसे समाज में धार्मिक और नैतिक शिक्षा के रूप में भी देखा जाता है।

धार्मिक शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन किया गया व्रत पूरे साल के लिए परिवार में सकारात्मक वातावरण लाता है। विशेष रूप से भाद्रपद द्वादशी के दिन माता-पिता के आशीर्वाद और पूजा के माध्यम से संतानों की रक्षा होती है और उनके भविष्य के लिए शुभ संकेत मिलते हैं।


बछबारस व्रत केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि यह पारिवारिक एकता और बच्चों के प्रति माता-पिता के स्नेह को भी दर्शाता है। यह व्रत समाज में पारंपरिक मूल्य और संस्कृति को बनाए रखने का माध्यम भी है।