पौष पूर्णिमा 2026: मां लक्ष्मी और चंद्र देव की कृपा पाने का सुनहरा अवसर, इस विधि से करें पूजा
सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व है, और जब बात साल की पहली पूर्णिमा यानी पौष पूर्णिमा की हो, तो इसका आध्यात्मिक वजन और भी बढ़ जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, पौष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को पौष पूर्णिमा कहा जाता है। साल 2026 की पहली पूर्णिमा कल यानी 3 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। यह दिन न केवल पूजा पाठ के लिए श्रेष्ठ है, बल्कि यह वह दिन है जो 'माघ स्नान' के संकल्प की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने और सामर्थ्य अनुसार दान करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उसके जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं।
पौष पूर्णिमा 2026: शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि का आरंभ और समापन समय कुछ इस प्रकार है: पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 2 जनवरी 2026 को शाम 07:15 बजे से। पूर्णिमा तिथि समाप्त: 3 जनवरी 2026 को रात 09:30 बजे तक। उदयातिथि के अनुसार: 3 जनवरी 2026 को ही पूर्णिमा का व्रत और मुख्य स्नान दान किया जाएगा। अमृत काल और ब्रह्म मुहूर्त: स्नान के लिए सुबह 05:25 से 06:15 का समय सर्वोत्तम है। यदि आप सत्यनारायण भगवान की पूजा करना चाहते हैं, तो सुबह 09:00 बजे के बाद का समय अत्यंत शुभ है।
स्नान और दान का पौराणिक महत्व
पौष पूर्णिमा को मोक्ष की दहलीज कहा जाता है। शास्त्र कहते हैं कि पौष का महीना सूर्य देव का महीना है और पूर्णिमा चंद्रमा की तिथि है। इसलिए, इस दिन सूर्य और चंद्रमा का अद्भुत संगम होता है। इस दिन स्नान दान करने से व्यक्ति की कुंडली में सूर्य और चंद्रमा दोनों मजबूत होते हैं। मान्यता: प्रयागराज, हरिद्वार और काशी जैसे तीर्थ स्थलों पर स्नान करने से "दोगुना फल" प्राप्त होता है। यदि आप नदी तक नहीं जा सकते, तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी उतना ही फलदायी माना गया है।
पूजन विधि: कैसे करें मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की आराधना?
ब्रह्म मुहूर्त स्नान: सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदी या गंगाजल युक्त जल से स्नान करें। सूर्य अर्घ्य: स्नान के बाद तांबे के लोटे में जल, लाल फूल और अक्षत डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें। व्रत का संकल्प: भगवान विष्णु के समक्ष हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। सत्यनारायण कथा: इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा सुनने या पढ़ने का विशेष महत्व है। उन्हें पीले फूल, फल और पंचामृत अर्पित करें। महालक्ष्मी पूजन: पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी के आगमन की रात मानी जाती है। रात्रि में अष्टलक्ष्मी या लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें और घी का दीपक जलाएं। चंद्र दर्शन: रात को चंद्रमा निकलने पर दूध और जल से अर्घ्य दें। इससे मानसिक तनाव दूर होता है और सुख-समृद्धि आती है।
पौष पूर्णिमा और माघ स्नान का संबंध
पौष पूर्णिमा से ही प्रयागराज में माघ मेले की औपचारिक शुरुआत होती है। जो लोग पूरे माघ महीने तक कल्पवास (नदी किनारे सादा जीवन बिताना) करते हैं, उनके संकल्प का दिन यही पूर्णिमा होती है। यहाँ से "सात्विक जीवन" का एक नया अध्याय शुरू होता है।