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रतन टाटा के आदर्शों को सर्वोपरि रखते हुए मेहली मिस्त्री का टाटा ट्रस्ट्स से विदाई: संस्थागत प्रतिष्ठा को विवादों से बचाने के लिए लिया गया निर्णायक कदम

रतन टाटा के करीबी सहयोगी और लंबे समय से कारोबारी मित्र रहे मेहली के. मिस्त्री ने टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे दिया है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब टाटा ट्रस्ट्स के भीतर आंतरिक मतभेद और गवर्नेंस से जुड़े विवाद खुलकर सामने आ चुके थे। मिस्त्री ने अपने इस निर्णय के पीछे रतन टाटा के मूल्यों और ट्रस्ट की प्रतिष्ठा को किसी भी अनावश्यक विवाद से बचाने के आदर्शों का हवाला दिया है। यह घटनाक्रम भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घराने के होल्डिंग निकाय टाटा ट्रस्ट्स में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देता है, जो टाटा संस में ६६% की निर्णायक हिस्सेदारी रखता है।


मेहली मिस्त्री तीन प्रमुख ट्रस्टों, जिनमें सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट शामिल हैं, के ट्रस्टी के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने ट्रस्टियों को लिखे अपने चार पन्नों के पत्र में स्पष्ट किया कि रतन टाटा की दृष्टि के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में यह जिम्मेदारी शामिल है कि "टाटा ट्रस्ट्स विवादों में न पड़ें और किसी भी विवाद को बढ़ाने से ट्रस्ट की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।" यह संदेश टाटा समूह की संस्थागत विरासत को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखने की उनकी भावना को दर्शाता है। मिस्त्री ने रतन टाटा को अपना सबसे प्रिय मित्र और मार्गदर्शक बताया, जिनके व्यक्तिगत समर्थन से उन्हें ट्रस्टी के रूप में सेवा करने का सौभाग्य मिला था।


मिस्त्री का कार्यकाल २८ अक्टूबर २०२५ को समाप्त हो गया था, और उनकी पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव को नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह सहित तीन ट्रस्टियों ने बहुमत से अस्वीकार कर दिया था। इस फैसले ने ट्रस्ट्स में लंबे समय से चल रहे नेतृत्व और संचालन संबंधी मतभेदों को सार्वजनिक रूप से उजागर कर दिया। मिस्त्री ने पहले महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष एक पूर्व-निर्णय याचिका (कैविएट) भी दायर की थी, जिसमें अनुरोध किया गया था कि उन्हें ट्रस्टियों की सूची में किसी भी बदलाव से पहले सुना जाए। हालांकि, उन्होंने बाद में इस कानूनी चुनौती को आगे न बढ़ाते हुए, अटकलों और अफवाहों पर विराम लगाने के लिए स्वेच्छा से पद छोड़ने का फैसला लिया।


मिस्त्री का इस्तीफा चेयरमैन नोएल टाटा के नेतृत्व वाले गुट के नियंत्रण और एकजुटता को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। अपने विदाई संदेश में मिस्त्री ने जोर देकर कहा कि "कोई भी व्यक्ति उस संस्था से बड़ा नहीं होता, जिसकी वह सेवा करता है।" उन्होंने शेष ट्रस्टियों से अपील की कि वे भविष्य में अपने कार्यों में पारदर्शिता, सुशासन और जनहित के सिद्धांतों को प्राथमिकता दें। उनका यह कदम रतन टाटा की उस विरासत को कायम रखने की दिशा में एक बड़ा बलिदान है, जो हमेशा सार्वजनिक हित को व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर रखने में विश्वास रखती थी।


इस इस्तीफे से, टाटा ट्रस्ट्स में चल रहे सत्ता संघर्ष और खींचतान का एक चरण समाप्त हो गया है। अब सभी की निगाहें ट्रस्ट बोर्ड की आगामी बैठक पर टिकी हैं और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ट्रस्ट अपनी ५०० वर्षीय विरासत को बनाए रखने के लिए किस तरह के सुशासन के कदम उठाता है।