तंबाकू टैक्स में भारी बढ़ोतरी से संकट में किसान: FAIFA ने दी तस्करी और व्यापार ठप होने की चेतावनी
भारतीय कृषि क्षेत्र में वाणिज्यिक फसलों का एक बड़ा हिस्सा तंबाकू से आता है। हाल ही में भारत सरकार द्वारा तंबाकू उत्पादों, विशेषकर सिगरेट और अन्य धुआंरहित तंबाकू पर उत्पाद शुल्क में की गई भारी बढ़ोतरी ने किसानों के बीच चिंता की लहर पैदा कर दी है। फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया फार्मर एसोसिएशन , जो लाखों तंबाकू किसानों का प्रतिनिधित्व करता है, ने इस कर वृद्धि को तत्काल वापस लेने की मांग की है।
क्या है मुख्य विवाद?
वित्त मंत्रालय ने हाल ही में एक अधिसूचना जारी की है, जो 1 फरवरी 2026 से प्रभावी होगी। इसके तहत सिगरेट की लंबाई के आधार पर ₹2,050 से ₹8,500 प्रति हजार स्टिक तक की नई उत्पाद शुल्क दरें निर्धारित की गई हैं। यह वृद्धि उस समय आई है जब तंबाकू किसानों को पहले से ही बढ़ती लागत और बाजार की अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है।
किसानों की चिंताएं और FAIFA के तर्क
FAIFA के अध्यक्ष मुरली बाबू ने सरकार के इस कदम पर निराशा व्यक्त करते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाए हैं: जीएसटी 2.0 के वादे का उल्लंघन: FAIFA का दावा है कि सितंबर 2025 में 'जीएसटी 2.0' की घोषणा के दौरान सरकार ने आश्वासन दिया था कि तंबाकू उत्पादों पर कुल कर का बोझ अपरिवर्तित रहेगा। लेकिन नई अधिसूचना इस आश्वासन के विपरीत कर के बोझ को काफी बढ़ा देती है। बाजार में गिरावट का डर: जब भी तंबाकू उत्पादों पर टैक्स बढ़ता है, कंपनियां इसका बोझ ग्राहकों पर डालती हैं। कीमतों में वृद्धि से वैध सिगरेट की मांग कम हो सकती है, जिससे अंततः किसानों से होने वाली तंबाकू की खरीद में गिरावट आएगी।
तस्करी को बढ़ावा: भारत पहले से ही दुनिया का चौथा सबसे बड़ा अवैध सिगरेट बाजार है। FAIFA के अनुसार, वैध उत्पादों पर अत्यधिक कर लगाने से तस्करी वाले विदेशी सिगरेट सस्ते हो जाएंगे, जिससे सरकार के राजस्व को नुकसान होगा और स्थानीय किसानों की मांग खत्म हो जाएगी। किसानों के बीच भेदभाव: FCV तंबाकू उगाने वाले किसान, जो मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में हैं, सबसे अधिक प्रभावित हैं। बीड़ी और अन्य चबाने वाले तंबाकू की तुलना में सिगरेट पर कर का बोझ 30 से 50 गुना अधिक है, जिसे FAIFA ने 'भेदभावपूर्ण' बताया है।
आजीविका पर संकट
तंबाकू की खेती भारत के कई राज्यों में लाखों लोगों को रोजगार देती है। FAIFA का कहना है कि पिछले दशक में खेती का रकबा पहले ही 2.21 लाख हेक्टेयर से घटकर 1.22 लाख हेक्टेयर रह गया है। इनपुट लागत (उर्वरक और मजदूरी) में 15% से 23% की वृद्धि के बीच नया कर बोझ किसानों की कमर तोड़ देगा